Category: Economics

  • NCERT Class 10th – Economics – Chapter 05.  उपभोक्ता अधिकार (Consumer Rights)

    उपभोक्ता अधिकार (Consumer Rights) – एक संपूर्ण अध्ययन मॉड्यूल
    कक्षा 10 – अर्थशास्त्र

    उपभोक्ता अधिकार Consumer Rights

    परीक्षा की तैयारी हेतु एक संपूर्ण और स्व-निहित शिक्षण मॉड्यूल

    1986
    COPRA पारित
    24 दिसंबर
    राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस
    6
    मुख्य अधिकार
    3
    स्तरीय न्यायिक तंत्र

    बाज़ार में उपभोक्ता

    Consumer in the Marketplace

    बाज़ार में हमारी भागीदारी उत्पादक (कृषि, उद्योग, या सेवा क्षेत्र) और उपभोक्ता (वस्तुओं या सेवाओं को खरीदने वाले) दोनों रूपों में होती है।

    अकेला उपभोक्ता प्रायः कमजोर स्थिति में होता है, इसलिए नियमों और विनियमों की आवश्यकता है।

    बाज़ार में शोषण के प्रकार

    कम वजन तौलना

    अनुचित व्यापार

    अप्रकट शुल्क

    छुपे हुए charges

    मिलावटी वस्तुएँ

    दोषपूर्ण उत्पाद

    बाज़ार कब ठीक से काम नहीं करता?

    • उत्पादक शक्तिशाली और कम संख्या में
    • उपभोक्ता बिखरे हुए
    • समृद्ध कंपनियाँ मीडिया के माध्यम से गलत सूचना देती हैं

    उपभोक्ता आंदोलन

    Consumer Movement

    भारत में उपभोक्ता आंदोलन का जन्म सामाजिक बल के रूप में, अनैतिक और अनुचित व्यवसाय कार्यों से उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करने की आवश्यकता के साथ हुआ।

    1960s
    व्यवस्थित उदय
    • • अत्यधिक खाद्य कमी
    • • जमाखोरी और कालाबाजारी
    • • खाद्य पदार्थों में मिलावट
    1970s
    संगठित गतिविधियाँ
    • • आलेखों का लेखन
    • • प्रदर्शनियों का आयोजन
    • • उपभोक्ता दल बनाना
    • • राशन दुकानों पर नज़र
    1986
    COPRA पारित

    उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम, 1986 – आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता

    उपभोक्ता इंटरनेशनल (Consumer International)

    • 1985 में संयुक्त राष्ट्र ने उपभोक्ता सुरक्षा के दिशा-निर्देश अपनाए
    • 100 से अधिक देशों के 200 संस्थाओं का संरक्षक संगठन

    उपभोक्ता सुरक्षा अधिनियम (COPRA)

    Consumer Protection Act

    COPRA 1986

    Consumer Protection Act

    यह कानून उपभोक्ताओं को शोषण से बचाने और उन्हें अधिकार प्रदान करने के लिए बनाया गया।

    COPRA संशोधन 2019 – नई विशेषताएँ

    • इंटरनेट के माध्यम से खरीद भी शामिल
    • सेवा प्रदाता और निर्माता दोनों ज़िम्मेदार
    • दंड या जेल का प्रावधान
    • तटस्थ मध्यस्थ की सहायता से निपटारा
    राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस

    भारत में 24 दिसंबर को राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस मनाया जाता है, क्योंकि 1986 में इसी दिन उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम पारित हुआ था।

    विश्व उपभोक्ता अधिकार दिवस: 15 मार्च

    उपभोक्ता अधिकार

    Consumer Rights under COPRA

    सुरक्षा का अधिकार

    वस्तुओं और सेवाओं के बाज़ारीकरण के खिलाफ सुरक्षित रहने का अधिकार

    उदाहरण: प्रेशर कुकर के सेफ्टी वॉल्व की उच्च गुणवत्ता

    सूचना का अधिकार

    वस्तुओं और सेवाओं के बारे में जानकारी पाने का अधिकार

    जानकारी: अवयव, MRP, निर्माण तिथि, समाप्ति तिथि, निर्माता का पता

    चयन का अधिकार

    सेवा प्राप्त करते हुए चुनने का अधिकार

    उल्लंघन: अनचाही वस्तु खरीदने का दबाव डालना

    सुनवाई का अधिकार

    प्रतिनिधित्व और आवाज़ उठाने का अधिकार

    मंच: उपभोक्ता अदालतें और आयोग

    निवारण (क्षतिपूर्ति) का अधिकार

    अनुचित सौदेबाजी के विरुद्ध मुआवजा पाने का अधिकार

    प्रक्रिया: स्वयं या वकील के साथ शिकायत दर्ज करना

    उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार

    अधिकारों और उपायों के बारे में जानकारी प्राप्त करने का अधिकार

    उद्देश्य: जागरूक और समझदार उपभोक्ता बनना

    केस स्टडीज़

    रेजी का कष्ट – सुरक्षा का अधिकार

    केरल के छात्र रेजी मैथ्यू को टॉन्सिल ऑपरेशन के दौरान अनुचित बेहोशी के कारण दिमागी असामान्यता हुई।

    राज्य समिति:

    मामला खारिज

    राष्ट्रीय समिति:

    अस्पताल को दोषी पाया, हर्जाना देने का निर्देश

    अबिरामी – चयन का अधिकार

    छात्रा ने कोचिंग संस्थान की फीस वापस माँगी जब पढ़ाई का स्तर ठीक नहीं था।

    जिला आयोग:

    ₹28,000 वापस करने का आदेश

    राज्य आयोग:

    ₹25,000 दंड + ₹7,000 मुआवजा

    अमृता – सूचना का अधिकार (RTI)

    स्नातक अमृता ने RTI (अक्टूबर 2005) का प्रयोग करके सरकारी विभाग से अपने इंटरव्यू का परिणाम माँगा।

    परिणाम: नियुक्ति का बुलावा पत्र प्राप्त हुआ

    त्रि-स्तरीय न्यायिक तंत्र

    Three-Tier Judicial System

    स्तर नाम दावे की सीमा
    जिला जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ₹1 करोड़ तक
    राज्य राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ₹1 करोड़ से ₹10 करोड़
    राष्ट्रीय राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ₹10 करोड़ से ऊपर

    अपील प्रक्रिया

    1

    जिला स्तर

    प्रथम शिकायत

    2

    राज्य स्तर

    अपील

    3

    राष्ट्रीय स्तर

    अंतिम अपील

    शिकायत दर्ज करने के तरीके

    शारीरिक रूप से

    उपभोक्ता केंद्र में जाकर

    इंटरनेट

    ऑनलाइन पोर्टल के माध्यम से

    वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग

    दूरस्थ सुनवाई

    ISI, Agmark और Hallmark

    Quality Certification Marks

    ISI

    आई.एस.आई.

    Indian Standards Institute

    उत्पाद: इलेक्ट्रिकल उपकरण, LPG सिलेंडर, सीमेंट

    Agmark

    एगमार्क

    Agricultural Marketing

    उत्पाद: कृषि उत्पाद, खाद्य तेल, मसाले, शहद

    हॉलमार्क

    Precious Metals

    उत्पाद: सोना, चाँदी के आभूषण

    अनिवार्य प्रमाणन वाले उत्पाद

    जो उत्पाद उपभोक्ता की सुरक्षा और स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं:

    एल.पी.जी. सिलेंडर खाद्य रंग सीमेंट बोतलबंद पेय जल

    जागरूक उपभोक्ता बनें

    Become an Aware Consumer

    अपने अधिकारों के प्रति सचेत रहने से उपभोक्ता अच्छे और बुरे में फर्क करने और श्रेष्ठ चुनाव करने में सक्षम होते हैं।

    खरीदते समय ध्यान दें

    • MRP (अधिकतम खुदरा मूल्य) जाँचें
    • निर्माण और समाप्ति तिथि देखें
    • ISI/Agmark/Hallmark चिह्न खोजें
    • बिल/रसीद अवश्य लें

    अपने अधिकारों को जानें

    • MRP से कम दाम पर मोल-भाव करें
    • MRP से अधिक पर शिकायत करें
    • दोषपूर्ण वस्तु पर मुआवजा माँगें
    • अनचाही खरीद के दबाव को मना करें

    महत्वपूर्ण संसाधन

    केंद्रीय सरकार

    https://consumeraffairs.nic.in

    CUTS International

    www.cuts-international.org

    उपभोक्ता संगठन

    भारत में उपभोक्ता आंदोलन ने कई महत्वपूर्ण संगठनों को जन्म दिया है:

    उपभोक्ता अदालतें

    उपभोक्ता संरक्षण परिषद

    उपभोक्ता संस्थाएँ

    मुख्य बिंदु – सारांश

    Key Points Summary

    उपभोक्ता आंदोलन
    • • 1960s में व्यवस्थित उदय
    • • 1986 में COPRA पारित
    • • 2019 में संशोधन
    • • 24 दिसंबर – राष्ट्रीय उपभोक्ता दिवस
    6 अधिकार
    • • सुरक्षा का अधिकार
    • • सूचना का अधिकार
    • • चयन का अधिकार
    • • सुनवाई का अधिकार
    • • निवारण का अधिकार
    • • उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार
    त्रि-स्तरीय तंत्र
    • • जिला: ₹1 करोड़ तक
    • • राज्य: ₹1-10 करोड़
    • • राष्ट्रीय: ₹10 करोड़+
    • • अपील की सुविधा
    गुणवत्ता चिह्न
    • • ISI – इलेक्ट्रिकल उपकरण
    • • Agmark – कृषि उत्पाद
    • • Hallmark – सोना/चाँदी
    • • कुछ उत्पादों के लिए अनिवार्य

    जागरूक उपभोक्ता बनकर हम अपने अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं और उपभोक्ता आंदोलन को मजबूत बना सकते हैं।

    कक्षा 10 अर्थशास्त्र – अध्याय 5: उपभोक्ता अधिकार

    परीक्षा की तैयारी हेतु विस्तृत अध्ययन सामग्री

  • NCERT Class 10th – Economics – Chapter 04.  वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था (Globalization and the Indian Economy)

    वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था – एक संपूर्ण अध्ययन मॉड्यूल
    कक्षा 10 – अर्थशास्त्र

    वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था Globalization and the Indian Economy

    परीक्षा की तैयारी हेतु एक संपूर्ण और स्व-निहित शिक्षण मॉड्यूल

    1991
    उदारीकरण की शुरुआत
    160+
    WTO सदस्य देश
    50-60%
    MNC की लागत बचत
    11 करोड़
    लघु-मध्यम उद्योग श्रमिक

    परिचय

    वैश्वीकरण की पृष्ठभूमि

    आज के विश्व में, उपभोक्ता के रूप में हमारे सामने वस्तुओं और सेवाओं के विस्तृत विकल्प उपलब्ध हैं। बाजारों में वस्तुओं के बहुव्यापी विकल्प अपेक्षाकृत नवीन परिघटना है।

    बीसवीं शताब्दी के मध्य तक

    • उत्पादन देशों की सीमाओं के अंदर सीमित था
    • व्यापार ही देशों को जोड़ने का मुख्य माध्यम
    • उपनिवेशों से कच्चा माल, तैयार वस्तुओं का आयात

    आज का युग

    • बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) का उदय
    • उत्पादन विश्व भर में फैला हुआ
    • विस्तृत विकल्प उपलब्ध

    सूचना के स्त्रोत (Information Sources)

    ILO

    अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन

    www.ilo.org

    न्यायसंगत वैश्वीकरण की अपील

    WTO

    विश्व व्यापार संगठन

    www.wto.org

    व्यापार समझौतों की जानकारी

    Corporate Watch

    MNC आलोचनात्मक जाँच

    www.corporatewatch.org.uk

    बहुराष्ट्रीय कंपनियों की निगरानी

    आधुनिक बाजार में उपलब्ध उत्पाद

    डिजिटल कैमरे
    मोबाइल फ़ोन
    टेलीविजन
    नई मॉडल गाड़ियाँ

    बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ (MNCs)

    Multinational Corporations

    परिभाषा

    एक बहुराष्ट्रीय कंपनी (MNC) वह है जो एक से अधिक देशों में उत्पादन पर नियंत्रण अथवा स्वामित्व रखती है।

    MNC अन्य देशों में क्यों जाती हैं?

    सस्ता श्रम

    कम लागत पर कुशल और अकुशल श्रमिक

    अन्य संसाधन

    उत्पादन के अन्य कारकों की उपलब्धता

    लागत में कमी

    उत्पादन लागत में कटौती

    अधिक लाभ

    मुनाफे में वृद्धि

    MNC उत्पादन का उदाहरण (औद्योगिक उपकरण)

    डिज़ाइन

    अमेरिका

    पुर्ज़े निर्माण

    चीन

    जोड़ना

    मेक्सिको/पूर्वी यूरोप

    बिक्री

    विश्व भर में

    ग्राहक सेवा

    भारत (कॉल सेंटर)

    विश्व-भर के उत्पादन को जोड़ना

    Interlinking Production Across Countries

    उत्पादन विस्तार में लाभप्रद स्थान

    चीन

    सस्ता विनिर्माण केंद्र

    मेक्सिको/पूर्वी यूरोप

    अमेरिका और यूरोप के बाजारों से निकटता

    भारत

    कुशल इंजीनियर और अंग्रेज़ी बोलने वाले शिक्षित युवा

    इससे MNC की लागत का 50-60 प्रतिशत बचत होती है!

    सीमाओं के पार बहुराष्ट्रीय उत्पादन प्रक्रिया के प्रसार से असीमित लाभ प्राप्त किया जा सकता है। MNCs स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी करके, आपूर्ति के लिए उनका इस्तेमाल करके, या निकट प्रतिस्पर्धा करके/उन्हें खरीदकर दूरस्थ स्थानों के उत्पादन पर अपना प्रभाव जमा रही हैं।

    MNCs द्वारा उत्पादन नियंत्रण के तरीके

    1

    संयुक्त उत्पादन (Joint Production)

    स्थानीय कंपनियों के साथ साझेदारी

    लाभ: अतिरिक्त निवेश + नवीनतम प्रौद्योगिकी

    2

    स्थानीय कंपनियों को खरीदना (Acquisition)

    सबसे आम रास्ता

    उदाहरण: कारगिल फूड्स ने परख फूड्स को खरीदा – अब भारत में खाद्य तेलों की सबसे बड़ी उत्पादक

    3

    छोटे उत्पादकों को ऑर्डर देना

    वस्त्र, जूते-चप्पल, खेल के सामान

    नियंत्रण: मूल्य, गुणवत्ता, आपूर्ति, श्रम शर्तें

    निवेश (Investment)

    परिसंपत्तियों (जैसे भूमि, भवन, मशीन और अन्य उपकरण) की खरीद में व्यय की गई मुद्रा।

    विदेशी निवेश (Foreign Investment)

    बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा किया गया निवेश, जो लाभ अर्जित करने की आशा से किया जाता है।

    फोर्ड मोटर्स – केस स्टडी

    विश्व की सबसे बड़ी मोटरगाड़ी निर्माता

    तथ्य:
    • 26 देशों में प्रसार
    • 1995 में भारत आई
    • चेन्नई के निकट ₹1,700 करोड़ का निवेश
    भारत में आने के कारण:
    • विशाल बाजार का लाभ
    • कम उत्पादन लागत
    • स्थानीय पुर्ज़ा आपूर्तिकर्ता
    • भारत और चीन के ग्राहकों से निकटता

    विदेश व्यापार और बाजारों का एकीकरण

    Foreign Trade and Market Integration

    विदेश व्यापार के लाभ

    • उत्पादकों को घरेलू बाजारों से बाहर पहुँचने का अवसर
    • विश्व के अन्य देशों के बाजारों में प्रतिस्पर्धा
    • खरीदारों के लिए अधिक विकल्प

    भारत में चीन के खिलौने – केस स्टडी

    चीनी खिलौनों की सफलता:
    • सस्ते दाम
    • नवीन डिज़ाइन
    परिणाम:

    70-80%

    एक वर्ष में दुकानों में भारतीय खिलौनों का स्थान चीनी खिलौनों ने ले लिया

    भारतीय खरीदार

    कम कीमत पर अधिक विकल्प

    चीनी निर्माता

    व्यवसाय फैलाने का अवसर

    भारतीय निर्माता

    खिलौने कम बिकते हैं – हानि

    बाजारों का एकीकरण

    • वस्तुओं का एक बाजार से दूसरे बाजार में आवागमन
    • दो बाजारों में एक ही वस्तु का मूल्य एक समान होने लगता है
    • उत्पादक हजारों मील दूर होकर भी प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं

    MNCs और विदेश व्यापार: जैसे फोर्ड मोटर्स का कार संयंत्र केवल भारत के लिए ही कारों का निर्माण नहीं करता, बल्कि वह अन्य देशों को भी कारें और पुर्ज़े निर्यात करता है। विदेश व्यापार का एक बड़ा भाग बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा नियंत्रित है।

    वैश्वीकरण क्या है?

    What is Globalization?

    परिभाषा

    वैश्वीकरण (Globalization) विभिन्न देशों के बीच परस्पर संबंध और तीव्र एकीकरण की प्रक्रिया है।

    वैश्वीकरण में क्या-क्या का आदान-प्रदान होता है?

    वस्तुएँ और सेवाएँ

    निवेश

    प्रौद्योगिकी

    विदेश व्यापार

    बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ वैश्वीकरण की प्रक्रिया में मुख्य भूमिका निभा रही हैं।

    वैश्वीकरण को संभव बनाने वाले कारक

    Factors Enabling Globalization

    1
    प्रौद्योगिकी में तीव्र उन्नति

    परिवहन प्रौद्योगिकी
    • तीव्रतर आपूर्ति कम लागत पर
    • कंटेनरों का उपयोग: ढुलाई-लागत में भारी बचत
    • वायु यातायात की लागत में गिरावट
    सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी (IT)
    • टेलीग्राफ, टेलीफोन, मोबाइल, फैक्स
    • संचार उपग्रहों द्वारा सुगम
    • इंटरनेट: ई-मेल, वॉइस मेल

    संचार प्रौद्योगिकी का उपयोग – उदाहरण

    लंदन के पाठकों के लिए प्रकाशित पत्रिका की डिज़ाइनिंग और छपाई दिल्ली में की जाती है।

    इंटरनेट

    पाठ्य-विषय भेजना

    दूरसंचार

    निर्देश प्राप्त करना

    ई-बैंकिंग

    तत्काल भुगतान

    विदेश व्यापार का उदारीकरण

    Liberalization of Foreign Trade

    व्यापार अवरोधक (Trade Barriers)

    आयात पर कर (Tax) लगाना एक उदाहरण है। इसे अवरोधक इसलिए कहा गया है क्योंकि यह कुछ प्रतिबंध लगाता है।

    उपयोग:
    • विदेश व्यापार को नियमित करना
    • किस प्रकार की वस्तुएँ कितनी मात्रा में आयात हों
    अन्य प्रकार:

    कोटा (Quota): आयात होने वाली वस्तुओं की संख्या सीमित करना

    स्वतंत्रता के बाद – 1991 से पहले

    • घरेलू उत्पादकों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से संरक्षण
    • केवल अनिवार्य चीज़ों के आयात की अनुमति
    • मशीनरी, उर्वरक, पेट्रोलियम

    1991 के बाद – उदारीकरण

    • विश्व के उत्पादकों से प्रतिस्पर्धा का समय
    • अवरोधकों को हटाना
    • गुणवत्ता में सुधार की आवश्यकता

    उदारीकरण (Liberalization) की परिभाषा

    सरकार द्वारा अवरोधकों अथवा प्रतिबंधों को हटाने की प्रक्रिया।

    व्यवसायियों को मुक्त रूप से यह निर्णय लेने की अनुमति कि वे क्या आयात या निर्यात करना चाहते हैं।

    विश्व व्यापार संगठन (WTO)

    World Trade Organization

    WTO का ध्येय

    अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाना

    • शुरुआत विकसित देशों की पहल पर
    • अंतर्राष्ट्रीय व्यापार से संबंधित नियमों को निर्धारित करना
    • विश्व के लगभग 160 देश सदस्य हैं

    व्यवहारिक असमानता

    • WTO सभी देशों को मुक्त व्यापार की सुविधा देता है
    • विकसित देशों ने अनुचित ढंग से व्यापार अवरोधकों को बरकरार रखा है
    • विकासशील देशों को अवरोधकों को हटाने के लिए विवश किया

    कृषि उत्पादों पर वाद-विवाद – उदाहरण

    अमेरिका में कृषि:
    • GDP में हिस्सा: 1%
    • रोज़गार में हिस्सा: 0.5%
    समस्या:

    भारी सब्सिडी के कारण अमेरिकी किसान असाधारण रूप से कम कीमत पर बेच सकते हैं

    परिणाम: विकासशील देशों के कृषकों को बुरी तरह प्रभावित करता है

    WTO के बारे में अतिरिक्त जानकारी

    स्थापना: 1 जनवरी 1995
    मुख्यालय: जिनेवा, स्विट्जरलैंड
    पूर्ववर्ती: GATT (General Agreement on Tariffs and Trade)

    मुख्य समझौते:
    • TRIPS (बौद्धिक संपदा)
    • TRIMS (निवेश उपाय)
    • Agreement on Agriculture

    विकासशील देश विकसित देशों की सरकारों से सवाल कर रहे हैं कि वे WTO नियमों की अनदेखी करके अपने किसानों को धन राशि देना क्यों जारी रखे हुए हैं।

    भारत में वैश्वीकरण का प्रभाव

    Impact of Globalization in India

    सकारात्मक प्रभाव

    उपभोक्ता लाभ (विशेषकर शहरी धनी वर्ग)
    • अधिक विकल्प उपलब्ध
    • उत्कृष्ट गुणवत्ता और कम कीमत
    • उच्चतर जीवन स्तर
    MNC का निवेश और रोज़गार

    सेलफ़ोन

    मोटर गाड़ियाँ

    इलेक्ट्रॉनिक्स

    ठंडे पेय

    जंक फूड

    बैंकिंग

    नए रोज़गार उत्पन्न हुए और स्थानीय कंपनियाँ समृद्ध हुईं

    भारतीय कंपनियों का उदय

    कुछ बड़ी भारतीय कंपनियाँ बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रूप में उभरीं:

    टाटा मोटर्स इन्फ़ोसिस (IT) रैनबैक्सी एशियन पेंट्स सुंदरम फ़ास्नर्स
    IT सेवा क्षेत्र को अवसर
    • • डेटा एंट्री
    • • लेखाकरण
    • • प्रशासनिक कार्य
    • • इंजीनियरिंग

    ये सेवाएँ विकसित देशों को निर्यात की जाती हैं

    नकारात्मक प्रभाव

    वैश्वीकरण ने बड़ी संख्या में छोटे उत्पादकों और श्रमिकों के लिए बड़ी चुनौतियाँ खड़ी की हैं।

    प्रभावित उद्योग:
    बैटरी संधारित्र प्लास्टिक खिलौने टायर डेयरी उत्पाद खाद्य तेल

    छोटे उत्पादकों की चुनौतियाँ

    Challenges for Small Producers

    रवि – संधारित्र निर्माता (केस स्टडी)

    होसुर, तमिलनाडु

    1992:

    संधारित्र (Capacitors) बनाने वाली कंपनी शुरू की

    2001:

    WTO समझौते के अनुसार आयात प्रतिबंध हटे

    परिणाम:
    • भारतीय TV कंपनियाँ आयातित संधारित्र खरीदने लगीं (आधी कीमत)
    • उत्पादन बहुत कम हो गया
    • कई दोस्तों ने इकाइयाँ बंद कर दीं

    श्रमिकों की समस्याएँ

    • रोज़गार सुनिश्चित नहीं – नियोक्ता लचीलापन पसंद करते हैं
    • अस्थायी रोज़गार – वर्ष भर वेतन नहीं
    • बहुत लंबे कार्य-घंटे, रात में भी काम
    • काफी कम मज़दूरी
    • संरक्षण और लाभ नहीं (स्वास्थ्य बीमा, भविष्य निधि)
    वस्त्र निर्यात उद्योग में श्रमिकों की स्थिति

    वस्त्र निर्यातकों के बीच प्रतिस्पर्धा से MNCs को अधिक लाभ कमाने में मदद मिली है, लेकिन श्रमिकों को वैश्वीकरण से मिले लाभों में न्यायसंगत हिस्सा नहीं दिया गया है।

    • संगठित क्षेत्रक के श्रमिकों की कार्य-परिस्थितियाँ असंगठित क्षेत्रक के समान होती जा रही हैं
    • वर्तमान में इस पर बहस चल रही है कि क्या कंपनियों को रोज़गार नीतियों के मुद्दे पर लचीलापन अपनाना चाहिए

    विशेष आर्थिक क्षेत्र (Special Economic Zones – SEZ)

    विदेशी कंपनियों को आकर्षित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें SEZ स्थापित कर रही हैं।

    सुविधाएँ:
    • विश्व स्तरीय सुविधाएँ (बिजली, पानी, सड़क)
    • 5 वर्षों तक कोई कर नहीं
    श्रम-कानूनों में लचीलापन:

    कंपनियाँ श्रमिकों को छोटी अवधि के लिए रखती हैं, जिससे श्रम लागत में कटौती होती है।

    न्यायसंगत वैश्वीकरण के लिए संघर्ष

    Struggle for Fair Globalization

    असमान प्रभाव

    लाभान्वित
    • • शिक्षित लोग
    • • कुशल लोग
    • • संपन्न लोग
    प्रभावित
    • • छोटे उत्पादक
    • • श्रमिक
    • • गरीब वर्ग

    न्यायसंगत वैश्वीकरण

    वह जो सभी के लिए अवसर प्रदान करेगा और यह सुनिश्चित करेगा कि वैश्वीकरण के लाभों में सबकी बेहतर हिस्सेदारी हो।

    सरकार की भूमिका

    • देश के सभी लोगों के हितों का संरक्षण करना
    • श्रमिक कानूनों का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित करना
    • छोटे उत्पादकों को मदद करना जब तक वे सक्षम न हों
    • आवश्यक होने पर व्यापार अवरोधकों का उपयोग करना
    • WTO से “न्यायसंगत नियमों” के लिए समझौते करना

    जनता की भूमिका

    • विकासशील देशों को WTO में वर्चस्व के विरुद्ध मिलकर लड़ना होगा
    • बड़े अभियानों और जनसंगठनों ने WTO के महत्वपूर्ण निर्णयों को प्रभावित किया है
    • जनता भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है
    ILO का न्यायसंगत वैश्वीकरण पर दृष्टिकोण

    अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (ILO) ने अपनी वेबसाइट पर न्यायसंगत वैश्वीकरण (Fair Globalization) की अपील की है।

    मुख्य सिद्धांत:

    • • सभी के लिए समान अवसर
    • • श्रमिक अधिकारों का संरक्षण
    • • सामाजिक सुरक्षा का विस्तार

    लक्ष्य:

    • • गरीबी उन्मूलन
    • • सतत विकास
    • • सामाजिक न्याय
    भारत में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (FDI) – अतिरिक्त आँकड़े

    प्रमुख निवेशक देश

    मॉरीशस, सिंगापुर, USA, जापान, नीदरलैंड

    प्रमुख क्षेत्र

    सेवाएँ, कंप्यूटर सॉफ्टवेयर, दूरसंचार, ऑटोमोबाइल

    प्रमुख राज्य

    महाराष्ट्र, कर्नाटक, दिल्ली, तमिलनाडु, गुजरात

    मुख्य बिंदु – सारांश

    Key Points Summary

    वैश्वीकरण
    • • देशों के बीच तीव्र एकीकरण
    • • विदेश व्यापार और विदेशी निवेश द्वारा
    • • MNCs मुख्य भूमिका में
    • • प्रौद्योगिकी ने संभव बनाया
    MNCs
    • • एक से अधिक देशों में उत्पादन
    • • सस्ता श्रम और संसाधन
    • • 50-60% लागत बचत
    • • स्थानीय कंपनियों का अधिग्रहण
    उदारीकरण
    • • 1991 से शुरू
    • • व्यापार अवरोधकों को हटाना
    • • WTO का दबाव
    • • प्रतिस्पर्धा में वृद्धि
    न्यायसंगत वैश्वीकरण
    • • सभी के लिए अवसर
    • • लाभों में बेहतर हिस्सेदारी
    • • सरकार की भूमिका महत्वपूर्ण
    • • श्रमिक अधिकारों की सुरक्षा

    वैश्वीकरण से लाभ धनी उपभोक्ता और कुशल, शिक्षित उत्पादकों को मिला है, जबकि छोटे उत्पादक और श्रमिक प्रभावित हुए हैं। न्यायसंगत वैश्वीकरण सभी के लिए आवश्यक है।

    कक्षा 10 अर्थशास्त्र – अध्याय 4: वैश्वीकरण और भारतीय अर्थव्यवस्था

    परीक्षा की तैयारी हेतु विस्तृत अध्ययन सामग्री

  • NCERT Class 10th – Economics – Chapter 03. मुद्रा और साख (Money and Credit)

    मुद्रा और साख (Money and Credit) – एक संपूर्ण अध्ययन मॉड्यूल
    कक्षा 10 – अर्थशास्त्र

    मुद्रा और साख Money and Credit

    परीक्षा की तैयारी हेतु एक संपूर्ण और स्व-निहित शिक्षण मॉड्यूल

    RBI
    करेंसी नोट जारी करता है
    15%
    नकद आरक्षित अनुपात
    51%
    ग्रामीण ऋण – व्यावसायिक बैंक
    2006
    यूनुस को नोबेल पुरस्कार

    परिचय

    मुद्रा के आधुनिक रूप और बैंक प्रणाली

    यह अध्याय मुद्रा (Money) और साख (Credit) के तत्व को उभारने और समझने पर केंद्रित है। मुद्रा के आधुनिक रूप बैंक प्रणाली से जुड़े हुए हैं।

    वर्तमान भारतीय संदर्भ में, बैंकिंग प्रणाली के कंप्यूटरीकरण के कारण मुद्रा के नए रूपों का धीरे-धीरे विस्तार हो रहा है।

    विमुद्रीकरण (Demonetization) – नवंबर 2016

    • 500 और 1000 रुपये के करेंसी नोटों को अमान्य घोषित किया गया
    • नए नोट (500 तथा 2000 रुपये) प्राप्त करने के लिए बैंकों में जमा
    • नकदी के स्थान पर बैंक जमाओं को प्रयोग करने के लिए प्रोत्साहन

    नकदीरहित/गैर-नकद लेनदेन विधियाँ

    बैंक से बैंक हस्तांतरण
    इंटरनेट बैंकिंग
    मोबाइल फोन
    चेक
    ए.टी.एम. कार्ड
    पी.ओ.एस. मशीन

    महत्वपूर्ण: प्लास्टिक कार्ड (क्रेडिट/डेबिट) मौद्रिक लेनदेन के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन वे स्वयं मुद्रा नहीं हैं।

    मुद्रा: विनिमय का एक माध्यम

    Money as a Medium of Exchange

    मुद्रा वह वस्तु है जो लेन-देन में विनिमय का माध्यम बन सकती है। लोग भुगतान के रूप में मुद्रा लेना पसंद करते हैं क्योंकि इसका विनिमय किसी भी वस्तु या सेवा को खरीदने के लिए आसानी से किया जा सकता है।

    वस्तु विनिमय प्रणाली (Barter System)

    • मुद्रा का उपयोग किए बिना वस्तुओं का विनिमय
    • आवश्यकताओं का दोहरा संयोग अनिवार्य
    • दोनों पक्षों को सहमत होना ज़रूरी

    समस्या: Double Coincidence of Wants – दोनों को एक दूसरे की वस्तुएँ चाहिए

    मुद्रा की मध्यस्थता

    • मुद्रा मध्यवर्ती भूमिका प्रदान करती है
    • दोहरे संयोग की ज़रूरत समाप्त
    • आसान और सुविधाजनक लेनदेन

    लाभ: कोई भी किसी से भी वस्तु/सेवा खरीद सकता है

    मुद्रा के ऐतिहासिक रूप

    प्रारंभिक काल

    अनाज और पशु

    बाद में

    सोना, चाँदी, ताँबे के सिक्के

    आधुनिक

    कागज़ के नोट और सिक्के

    करेंसी

    Currency – Modern Form of Money

    मुद्रा के आधुनिक रूपों में करेंसी (कागज़ के नोट और सिक्के) शामिल हैं। आधुनिक मुद्राएँ बहुमूल्य धातुओं की नहीं बनी होती हैं और इनका अपना कोई आंतरिक इस्तेमाल नहीं होता है।

    भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI)

    केंद्रीय बैंक

    • केंद्रीय सरकार की तरफ से करेंसी नोट जारी करता है
    • भारतीय कानून रुपये को विनिमय के माध्यम के रूप में वैधता प्रदान करता है
    • रुपये को सौदों में अदायगी के लिए अस्वीकार नहीं किया जा सकता

    मुख्य बिंदु: करेंसी को विनिमय का माध्यम इसलिए स्वीकार किया जाता है क्योंकि देश की सरकार इसे प्राधिकृत करती है।

    बैंकों में निक्षेप

    Bank Deposits

    लोग अतिरिक्त मुद्रा को बैंकों में अपने नाम से खाता खोलकर निक्षेप (Deposits) के रूप में रखते हैं।

    बैंकों की भूमिका:

    • जमाओं को स्वीकार करना
    • सूद (ब्याज) देना
    • धन को सुरक्षित रखना

    माँग जमा (Demand Deposits)

    बैंक खातों में जमा धन को माँग के ज़रिए निकाला जा सकता है, इसलिए इसे माँग जमा कहा जाता है।

    माँग जमा को भी आधुनिक अर्थव्यवस्था में मुद्रा समझा जाता है।

    चेक द्वारा भुगतान

    चेक (Cheque) एक कागज़ है जो बैंक को किसी व्यक्ति के खाते से चेक पर लिखे नाम के दूसरे व्यक्ति को एक खास रकम का भुगतान करने का आदेश देता है।

    लाभ: बिना नकद का इस्तेमाल किए सीधा भुगतान करना संभव

    बैंकों की ऋण संबंधी गतिविधियाँ

    Loan Activities of Banks

    नकद आरक्षित अनुपात

    ~15%

    कुल जमा का हिस्सा

    बैंक जनता से प्राप्त कुल जमा का एक छोटा हिस्सा अपने पास नकद के रूप में रखते हैं ताकि किसी विशेष दिन में जमाकर्ताओं द्वारा धन निकालने की मांग को पूरा किया जा सके।

    ऋण देना

    ~85%

    कुल जमा का हिस्सा

    बैंक जमा राशि के एक बड़े हिस्से का उपयोग ऋण (Loan) देने के लिए करते हैं।

    बैंक: मध्यस्थता की भूमिका

    जमाकर्ता

    अतिरिक्त राशि वाले

    बैंक

    कर्ज़दार

    जिन्हें राशि चाहिए

    बैंकों की आय का स्रोत

    जमाकर्ताओं को दिया जाने वाला ब्याज

    4%

    (उदाहरण)

    कर्ज़दारों से लिया जाने वाला ब्याज

    10%

    (उदाहरण)

    यह अंतर (6%) = बैंकों की आय का प्रमुख स्रोत

    साख की दो भिन्न स्थितियाँ

    Two Different Situations of Credit

    ऋण (Credit) की परिभाषा:

    यह एक सहमति है जहाँ साहूकार कर्ज़दार को धन, वस्तुएँ या सेवाएँ प्रदान करता है और बदले में भविष्य में भुगतान का वादा लेता है।

    सलीम – सकारात्मक भूमिका

    जूता निर्माता, त्योहार का मौसम

    • ऋण का उपयोग कार्यशील पूँजी की ज़रूरतों के लिए
    • अग्रिम भुगतान लेना या बाद में भुगतान का वादा
    • समय पर उत्पादन पूरा करना
    • लाभ कमाना और कमाई बढ़ाना

    परिणाम: स्थिति में सुधार

    स्वप्ना – नकारात्मक भूमिका

    छोटी किसान, कर्ज़-जाल

    • खेती के खर्चों के लिए साहूकार से ऋण
    • फसल बर्बाद हो जाना
    • कर्ज़ एक बड़ी रकम बन जाना
    • ज़मीन बेचनी पड़ी

    परिणाम: कर्ज़-जाल (Debt-Trap)

    निष्कर्ष: ऋण उपयोगी होगा या नहीं, यह परिस्थितियों के खतरों और हानि होने पर प्राप्त सहयोग की संभावना पर निर्भर करता है।

    ऋण की शर्तें

    Terms of Credit

    ग्रामीण क्षेत्रों में साख की मुख्य मांग फसल उगाने के लिए होती है।

    ऋण की शर्तें (Terms of Credit)

    • 1
      ब्याज दर – मूल रकम के साथ अदा
    • 2
      समर्थक ऋणाधार (Collateral)
    • 3
      आवश्यक कागज़ात
    • 4
      भुगतान के तरीके

    समर्थक ऋणाधार (Collateral)

    वह संपत्ति जिसका मालिक कर्ज़दार है और जो उधारदाता को गारंटी के रूप में दी जाती है।

    भूमि, इमारत

    गाड़ी

    पशु

    बैंकों में पूँजी

    यदि कर्ज़दार उधार वापस नहीं कर पाता, तो उधारदाता को समर्थक ऋणाधार बेचने का अधिकार होता है।

    आवास ऋण का उदाहरण – मेघा

    आवश्यकताएँ:

    • नौकरी और वेतन संबंधी रिकॉर्ड दिखाना
    • नए घर के सभी कागज़ ऋणाधार के रूप में

    प्रक्रिया:

    • बैंक कागज़ात रखता है
    • कर्ज़ लौटाने पर कागज़ात वापस

    विविध प्रकार के साख प्रबंध

    एक गाँव का उदाहरण

    श्यामल – छोटा किसान

    अनौपचारिक ऋण

    पहले (महाजन से):

    60% वार्षिक

    (5% मासिक)

    अब (कृषि व्यापारी से):

    36% वार्षिक

    (3% मासिक)

    शर्त: फसल तैयार होने पर उसी व्यापारी को बेचनी होगी (व्यापारी सस्ते में खरीदकर मुनाफा कमाता है)

    अरुण – मध्यम किसान

    औपचारिक ऋण

    बैंक से ऋण:

    8.5% वार्षिक

    लाभ: आलू की फसल को शीत भंडार गृह में रखकर उसके बदले नया ऋण ले सकता है

    रमा – भूमिहीन कृषि मज़दूर

    अनौपचारिक ऋण

    भू-स्वामी-नियोक्ता से:

    60% वार्षिक

    (5% मासिक)

    • कर्ज़ को काम करके वापस करती है
    • पुराना ऋण चुकाए बिना नया ऋण लेना पड़ता है
    • भूमिहीनों के लिए एकमात्र स्रोत

    सहकारी समितियों से ऋण

    ग्रामीण क्षेत्रों में सस्ते ऋण का एक अन्य स्रोत सहकारी समितियाँ हैं।

    • सदस्य अपने संसाधनों को एकत्र करते हैं
    • जमा पूँजी को ऋणाधार मानकर बैंक से ऋण प्राप्त
    • कृषि उपकरण, खेती, मछली पकड़ना, घर बनाने के लिए कर्ज़

    भारत में औपचारिक क्षेत्रक में साख

    Formal Sector Credit in India

    विशेषता औपचारिक स्रोत अनौपचारिक स्रोत
    उदाहरण बैंक, सहकारी समितियाँ साहूकार, व्यापारी, मालिक, रिश्तेदार, दोस्त
    निगरानी RBI द्वारा निगरानी कोई संस्था नहीं
    ब्याज दर कम (8-12%) बहुत अधिक (36-60%+)
    नियम सरकारी नियमों के अधीन ऐच्छिक, कोई नियम नहीं
    वसूली कानूनी तरीके नाजायज़ तरीके संभव

    ग्रामीण भारत में ऋण स्रोत (2019)

    51%

    व्यावसायिक बैंक

    सबसे बड़ा हिस्सा

    23%

    साहूकार

    अनौपचारिक

    भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की भूमिका

    • औपचारिक ऋण स्रोतों की कार्यप्रणाली पर नज़र रखना
    • बैंक न्यूनतम नकद शेष बनाए रखें
    • छोटे किसानों और छोटे उद्योगों को भी ऋण मिले
    • ऋण और ब्याज दरों की जानकारी लेना

    औपचारिक और अनौपचारिक साख – किसे क्या मिलता है?

    शहरी गरीब परिवार
    अनौपचारिक स्रोत 54%
    शहरी अमीर परिवार
    औपचारिक स्रोत 83%

    समस्या: अमीर सस्ते औपचारिक ऋण लेते हैं, जबकि गरीब को कर्ज़ के लिए बहुत अधिक पैसा देना पड़ता है।

    अनौपचारिक क्षेत्रक की समस्याएँ

    • देखरेख करने वाली कोई संस्था नहीं
    • ऐच्छिक दरों पर ऋण
    • नाजायज़ तरीकों से पैसे वापस लेना
    • ऋण की ऊँची लागत से ऋण-जाल में फँसना

    लक्ष्य: सस्ता और सामर्थ्य के अनुकूल कर्ज़ देश के विकास के लिए अति आवश्यक है। औपचारिक स्रोतों की गतिविधियों को ग्रामीण इलाकों में बढ़ाना चाहिए।

    निर्धनों के स्वयं सहायता समूह

    Self Help Groups (SHGs) for the Poor

    गरीबों की औपचारिक ऋण तक पहुँच में बाधाएँ

    • सभी ग्रामीण क्षेत्रों में बैंकों की अनुपस्थिति
    • ऋणाधार (Collateral) और विशेष कागज़ातों की ज़रूरत
    • ऋणाधार की अनुपलब्धता – प्रमुख कारण

    अनौपचारिक ऋणदाताओं की सुविधा

    साहूकार कर्ज़दारों को व्यक्तिगत स्तर पर जानते हैं, इसलिए वे अक्सर बिना ऋणाधार के भी ऋण देने को तैयार हो जाते हैं।

    लेकिन: वे ऊँची ब्याज दरें लेते हैं और नाजायज़ तरीके अपनाते हैं।

    स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups – SHGs)

    यह गरीबों, विशेषकर महिलाओं, को छोटे-छोटे समूहों (15-20 सदस्य) में संगठित करने और उनकी बचत पूँजी को एकत्र करने पर आधारित एक नया तरीका है।

    कैसे काम करता है:
    • सदस्य समूह से छोटे कर्ज़ ले सकते हैं
    • ब्याज साहूकार से कम होता है
    • 1-2 वर्षों की नियमित बचत के बाद बैंक से ऋण के योग्य
    ऋण का उद्देश्य:
    • समूह के नाम पर ऋण
    • सदस्यों के लिए स्वरोज़गार के अवसर

    SHG की भूमिका और लाभ

    • समूह के सदस्य स्वयं निर्णय लेते हैं (लक्ष्य, रकम, ब्याज दर, लौटाने की अवधि)
    • समूह की ज़िम्मेदारी ऋण वापस लौटाना
    • बैंक बिना ऋणाधार के भी ऋण देने को तैयार
    • ऋणाधार की कमी की समस्या से उबारना
    • महिलाएँ आर्थिक रूप से स्वावलंबी बनती हैं
    • सामाजिक विषयों (स्वास्थ्य, पोषण, घरेलू हिंसा) पर चर्चा का मंच

    बांग्लादेश का ग्रामीण बैंक (Grameen Bank)

    स्थापना: 1970

    प्रो. मोहम्‍मद यूनुस

    संस्थापक – 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार विजेता

    • उचित ब्याज दरों पर गरीबों की ऋण ज़रूरतों को पूरा करना
    • अधिकांश कर्ज़दार महिलाएं हैं
    • बहुत सफल मॉडल

    मुख्य बिंदु – सारांश

    Key Points Summary

    मुद्रा
    • • विनिमय का माध्यम
    • • RBI करेंसी नोट जारी करता है
    • • माँग जमा भी मुद्रा है
    • • दोहरे संयोग की ज़रूरत समाप्त
    बैंक
    • • 15% नकद आरक्षित
    • • 85% ऋण के लिए
    • • मध्यस्थता की भूमिका
    • • ब्याज का अंतर = आय
    साख/ऋण
    • • सकारात्मक और नकारात्मक दोनों भूमिकाएँ
    • • ऋण की शर्तें महत्वपूर्ण
    • • समर्थक ऋणाधार (Collateral)
    • • कर्ज़-जाल का खतरा
    औपचारिक vs अनौपचारिक
    • • औपचारिक: सस्ता, RBI निगरानी
    • • अनौपचारिक: महँगा, कोई निगरानी नहीं
    • • गरीब अनौपचारिक पर निर्भर
    • • SHGs समाधान प्रदान करते हैं

    मुद्रा के आधुनिक रूप (करेंसी और जमा) आधुनिक बैंक प्रणाली की कार्यप्रणाली से बहुत करीब से जुड़े हुए हैं।

    कक्षा 10 अर्थशास्त्र – अध्याय 3: मुद्रा और साख

    परीक्षा की तैयारी हेतु विस्तृत अध्ययन सामग्री

  • NCERT Class 10th – Economics – Chapter 02. अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of the Indian Economy)

    अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक (Sectors of the Indian Economy) – एक संपूर्ण अध्ययन मॉड्यूल
    कक्षा 10 – अर्थशास्त्र

    अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक Sectors of the Indian Economy

    परीक्षा की तैयारी हेतु एक संपूर्ण और स्व-निहित शिक्षण मॉड्यूल

    3
    मुख्य क्षेत्रक
    54%
    GDP में तृतीयक क्षेत्रक
    42%
    रोज़गार में कृषि
    100
    MGNREGA दिन

    परिचय

    अर्थव्यवस्था को समझने का आधार

    अर्थव्यवस्था को बेहतर ढंग से समझने के लिए उसके घटकों या क्षेत्रकों का अध्ययन आवश्यक है। इस अध्याय में तीन मुख्य प्रकार के वर्गीकरणों की चर्चा की गई है।

    तीन मुख्य वर्गीकरण

    कार्य के स्वभाव के आधार पर

    • प्राथमिक क्षेत्रक
    • द्वितीयक क्षेत्रक
    • तृतीयक क्षेत्रक

    रोज़गार की शर्तों के आधार पर

    • संगठित क्षेत्रक
    • असंगठित क्षेत्रक

    स्वामित्व के आधार पर

    • सार्वजनिक क्षेत्रक
    • निजी क्षेत्रक

    आर्थिक कार्यों के क्षेत्रक

    Primary, Secondary & Tertiary Sectors

    MCQ, SA, LA

    प्राथमिक क्षेत्रक (Primary Sector)

    यह क्षेत्रक प्राकृतिक संसाधनों के प्रत्यक्ष उपयोग पर आधारित है। यह अन्य सभी उत्पादों का आधार है।

    मुख्य विशेषताएँ:

    • प्रकृति से सीधे उत्पादन
    • वर्षा, सूर्य प्रकाश, जलवायु पर निर्भर
    • कृषि एवं सहायक क्षेत्रक भी कहा जाता है

    उदाहरण:

    कपास की खेती डेयरी उत्पादन खनन मत्स्य पालन वानिकी

    द्वितीयक क्षेत्रक (Secondary Sector)

    इस क्षेत्रक में प्राकृतिक उत्पादों को विनिर्माण प्रणाली के ज़रिए अन्य रूपों में परिवर्तित किया जाता है। इसे औद्योगिक क्षेत्रक भी कहा जाता है।

    मुख्य विशेषताएँ:

    • प्राथमिक क्षेत्रक के बाद का अगला कदम
    • वस्तुएँ निर्मित की जाती हैं
    • कारखाना, कार्यशाला या घर में उत्पादन

    उदाहरण:

    कपास → सूत कातना → कपड़ा बुनना

    गन्ना → चीनी/गुड़

    मिट्टी → ईंट

    तृतीयक क्षेत्रक (Tertiary Sector)

    यह क्षेत्रक स्वयं वस्तुओं का उत्पादन नहीं करता, बल्कि उत्पादन प्रक्रिया में सहयोग करता है। इसे सेवा क्षेत्रक भी कहा जाता है।

    मुख्य सेवाएँ:

    परिवहन भंडारण संचार बैंकिंग व्यापार

    अन्य सेवाएँ:

    शिक्षक डॉक्टर वकील IT/सॉफ्टवेयर कॉल सेंटर
    खंड 3

    सकल घरेलू उत्पाद (GDP)

    Gross Domestic Product

    GDP की गणना

    VSA, MCQ

    परिभाषा

    GDP = किसी देश के भीतर एक वर्ष में उत्पादित सभी अंतिम वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य

    (केवल अंतिम वस्तुओं का मूल्य लिया जाता है, मध्यवर्ती वस्तुओं का नहीं)

    महत्वपूर्ण अवधारणाएँ

    अंतिम वस्तुएँ: वे वस्तुएँ जो उपभोग के लिए तैयार हैं (जैसे बिस्कुट)

    मध्यवर्ती वस्तुएँ: अंतिम वस्तुओं के निर्माण में उपयोग होती हैं (जैसे गेहूं, आटा)

    क्षेत्रकों का GDP में योगदान (% में)

    क्षेत्रक 1973-74 2013-14 2023-24 परिवर्तन
    प्राथमिक (कृषि) 42% 14% 15% घटा
    द्वितीयक (उद्योग) 22% 27% 28% बढ़ा
    तृतीयक (सेवाएँ) 36% 59% 54% सर्वाधिक

    निष्कर्ष: तृतीयक क्षेत्रक ने प्राथमिक क्षेत्रक को प्रतिस्थापित कर सबसे बड़े उत्पादक क्षेत्रक के रूप में स्थान ले लिया है।

    नवीनतम आँकड़े (2024)

    • भारत की GDP (2024): $3.94 trillion (विश्व में 5वाँ स्थान)
    • GDP Growth Rate: 8.2% (FY 2023-24)
    • सेवा क्षेत्रक का योगदान: लगभग 54% of GVA
    • कृषि क्षेत्रक: GDP का 15%, लेकिन 42% रोज़गार
    स्रोत: Ministry of Statistics and Programme Implementation, Economic Survey 2023-24, World Bank Data
    खंड 4

    रोज़गार और बेरोज़गारी

    Employment & Underemployment

    रोज़गार की स्थिति

    SA, LA

    महत्वपूर्ण तथ्य: GDP में क्षेत्रकों की हिस्सेदारी बदल गई है, लेकिन रोज़गार में ऐसा परिवर्तन नहीं हुआ है। आज भी प्राथमिक क्षेत्रक सबसे बड़ा नियोक्ता है।

    क्षेत्रकों में रोज़गार (% में)

    क्षेत्रक 1973-74 2011-12 2023-24 GDP योगदान (2024)
    प्राथमिक 74% 49% 42% 15%
    द्वितीयक 11% 24% 26% 28%
    तृतीयक 15% 27% 32% 54%

    अल्प बेरोज़गारी (Underemployment)

    जहाँ लोग प्रत्यक्ष रूप से काम कर रहे हैं, लेकिन सभी अपनी क्षमता से कम काम करते हैं।

    उदाहरण: एक छोटे भूखंड पर परिवार के सभी 5 सदस्य काम करते हैं जबकि केवल 2 की आवश्यकता है।

    इसे छिपी हुई बेरोज़गारी या प्रच्छन्न बेरोज़गारी भी कहते हैं।

    खुली बेरोज़गारी (Open Unemployment)

    उन लोगों की बेरोज़गारी जो बेकार बैठे हैं और जिनके पास कोई रोज़गार नहीं है।

    शहरी क्षेत्र में: प्लम्बर, पेंटर, ठेला खींचने वाले भी अल्प बेरोज़गारी से प्रभावित।

    रोज़गार नवीनतम आँकड़े (2024)

    • भारत की बेरोज़गारी दर: 3.2% (PLFS 2023-24)
    • श्रम बल भागीदारी दर (LFPR): 57.9%
    • कृषि में रोज़गार: देश के 42% श्रमिक
    • युवा बेरोज़गारी (15-29 वर्ष): 10.2%
    स्रोत: Periodic Labour Force Survey (PLFS) 2023-24, National Statistical Office (NSO)

    अतिरिक्त रोज़गार सृजन के उपाय

    LA, SA

    सिंचाई का विस्तार

    • कुओं का निर्माण
    • नए बांधों का निर्माण
    • नहरें खोदना

    परिवहन और भंडारण

    • ग्रामीण सड़कें
    • फसल भंडारण
    • कोल्ड स्टोरेज

    सस्ते कृषि ऋण

    • कम ब्याज दर
    • बीज, उर्वरक खरीद
    • कृषि उपकरण

    अर्ध-ग्रामीण उद्योग

    • दाल मिल
    • शहद संग्रह केंद्र
    • प्रसंस्करण उद्योग

    शिक्षा और स्वास्थ्य

    • 20 लाख नए रोज़गार (शिक्षा)
    • डॉक्टर, नर्स
    • स्वास्थ्य कर्मचारी

    पर्यटन और शिल्प

    • 35 लाख+ रोज़गार
    • क्षेत्रीय शिल्प
    • स्थानीय कारीगर

    महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम-2005

    MGNREGA / मनरेगा

    मुख्य प्रावधान:
    • वर्ष में 100 दिन रोज़गार की गारंटी
    • 625+ ज़िलों में लागू
    • काम का अधिकार कानून
    विशेषताएँ:
    • रोज़गार न मिलने पर बेरोज़गारी भत्ता
    • भूमि उत्पादन बढ़ाने वाले कार्यों को वरीयता
    • ग्रामीण क्षेत्रों के लिए विशेष

    MGNREGA नवीनतम आँकड़े (2023-24)

    • कुल परिवार लाभार्थी: 5.7 करोड़ परिवार
    • औसत मज़दूरी: ₹220-280 प्रतिदिन (राज्य अनुसार)
    • महिला भागीदारी: 57% कार्यदिवस
    • कुल बजट आवंटन: ₹86,000 करोड़ (FY 2024-25)
    स्रोत: Ministry of Rural Development, MGNREGA Portal (nrega.nic.in), Union Budget 2024-25
    खंड 6

    संगठित और असंगठित क्षेत्रक

    Organized & Unorganized Sectors

    तुलनात्मक अध्ययन

    SA, LA, MCQ
    विशेषता संगठित क्षेत्रक असंगठित क्षेत्रक
    रोज़गार की अवधि नियमित और सुनिश्चित अनियमित और असुरक्षित
    पंजीकरण/नियंत्रण सरकारी नियमों का अनुपालन (कारखाना अधिनियम, न्यूनतम मज़दूरी अधिनियम) छोटी इकाइयाँ, सरकारी नियंत्रण से बाहर
    वेतन/लाभ
    • ओवरटाइम
    • सवेतन छुट्टी
    • भविष्य निधि
    • पेंशन
    • कम वेतन
    • कोई छुट्टी नहीं
    • कोई भत्ता नहीं
    • कभी भी निकाला जा सकता है
    दस्तावेज़ नियुक्ति-पत्र दिया जाता है कोई औपचारिक पत्र नहीं

    असंगठित क्षेत्रक के श्रमिकों का संरक्षण

    ग्रामीण क्षेत्र में असुरक्षित:
    • भूमिहीन कृषि श्रमिक
    • छोटे और सीमांत किसान (80% ग्रामीण परिवार)
    • फ़सल बंटाईदार
    • कारीगर
    शहरी क्षेत्र में असुरक्षित:
    • लघु उद्योगों के श्रमिक
    • निर्माण/व्यापार में आकस्मिक श्रमिक
    • सड़कों पर विक्रेता
    • घरेलू नौकर

    महत्वपूर्ण: अधिकांश असुरक्षित श्रमिक अनुसूचित जाति, जनजाति और पिछड़ी जातियों से हैं, जो सामाजिक भेदभाव के भी शिकार हैं।

    खंड 7

    सार्वजनिक और निजी क्षेत्रक

    Public & Private Sectors

    स्वामित्व आधारित क्षेत्रक

    MCQ, SA

    सार्वजनिक क्षेत्रक

    • परिसंपत्तियों पर सरकार का स्वामित्व
    • केवल लाभ कमाना ध्येय नहीं
    • करों से व्यय की भरपाई

    उदाहरण: रेलवे, डाकघर, BSNL, SBI, Air India

    निजी क्षेत्रक

    • एकल व्यक्ति या कंपनी का स्वामित्व
    • मुख्य ध्येय लाभ अर्जित करना
    • सेवाओं के लिए भुगतान आवश्यक

    उदाहरण: TISCO, Reliance, Infosys, HDFC Bank

    सार्वजनिक क्षेत्रक की आवश्यकता क्यों?

    भारी व्यय

    सड़कें, पुल, रेलवे, बिजली, सिंचाई – निजी क्षेत्रक की क्षमता से बाहर

    सरकारी समर्थन

    उद्योगों को सस्ती दर पर बिजली वितरण

    किसान/उपभोक्ता सहायता

    उचित मूल्य पर खरीद, राशन-दुकानों से कम मूल्य पर बिक्री

    प्राथमिक ज़िम्मेदारी

    स्वास्थ्य, शिक्षा, पेयजल, आवास, पोषण

    खंड 8

    अध्याय का सारांश

    प्रमुख तथ्य और निष्कर्ष

    1

    आर्थिक गतिविधियों को प्राथमिक, द्वितीयक, तृतीयक क्षेत्रकों में विभाजित करने की कसौटी ‘कार्य के स्वभाव’ पर आधारित है।

    2

    भारत में GDP में सबसे अधिक योगदान तृतीयक क्षेत्रक (54%) का है, लेकिन रोज़गार अधिकांशतः प्राथमिक क्षेत्रक (42%) में है।

    3

    संगठित/असंगठित क्षेत्रकों में विभाजन रोज़गार की परिस्थितियों पर आधारित है।

    4

    अधिकांश लोग असंगठित क्षेत्रक में कार्यरत हैं और उनके लिए संरक्षण और सहायता अनिवार्य है।

    5

    सार्वजनिक क्षेत्रक वहाँ आवश्यक है जहाँ निजी क्षेत्रक लाभ की कमी के कारण निवेश नहीं करता।

    6

    MGNREGA जैसी योजनाएँ ग्रामीण क्षेत्रों में रोज़गार सृजन का महत्वपूर्ण माध्यम हैं।

    अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रकों का संतुलित विकास ही समावेशी आर्थिक वृद्धि की कुंजी है।

    यह सामग्री ‘अर्थव्यवस्था के क्षेत्रक’ (Sectors of the Indian Economy) अध्याय पर आधारित है, जिसे विशेष रूप से परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए तैयार किया गया है।

    2024-25 | कक्षा 10 – अर्थशास्त्र | Updated: Nov 2024
  • NCERT Class 10th – Economics – Chapter 01. विकास (Development)

    विकास (Development) – एक संपूर्ण अध्ययन मॉड्यूल
    कक्षा 10 – अर्थशास्त्र

    विकास Development

    परीक्षा की तैयारी हेतु एक संपूर्ण और स्व-निहित शिक्षण मॉड्यूल

    16
    अध्ययन खंड
    5+
    तुलनात्मक तालिकाएँ
    HDI
    मानव विकास सूचकांक
    132
    भारत की HDI रैंक (पाठ्यपुस्तक)

    परिचय

    विकास का एक बहुआयामी दृष्टिकोण

    विकास की अवधारणा हमेशा से मानव आकांक्षाओं और इच्छाओं से जुड़ी रही है। इस अध्याय का उद्देश्य छात्रों को यह समझाना है कि विकास के कई पहलू हैं।

    लोगों के लिए विकास के लक्ष्य भिन्न-भिन्न होते हैं, और उनमें आपसी विरोध भी हो सकता है। विकास को मापने के लिए आय के अतिरिक्त जीवन की गुणवत्ता और धारणीयता जैसे नए संकेतकों का उपयोग करना आवश्यक है।

    अध्ययन के मुख्य विषय

    विभिन्न लोगों के विकास लक्ष्य
    देशों और राज्यों की तुलना
    प्रतिव्यक्ति आय की सीमाएँ
    मानव विकास रिपोर्ट (HDI)
    सामाजिक संकेतक
    विकास की धारणीयता

    संवृद्धि vs विकास

    Growth vs Development

    संवृद्धि (Growth)

    • मात्रात्मक शब्द – केवल संख्याओं में वृद्धि
    • आय या उत्पादन में वृद्धि पर केंद्रित

    उदाहरण: कंपनी की संवृद्धि दर में 10% की वृद्धि हुई। GDP में 7% की वृद्धि।

    विकास (Development)

    • गुणात्मक अवधारणा – व्यापक दृष्टिकोण
    • तकनीकी नवाचार, शिक्षा, स्वास्थ्य शामिल
    • सामाजिक न्याय पर बल

    उदाहरण: शिक्षा स्तर में सुधार, स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, लैंगिक समानता।

    आर्थिक विकास और आर्थिक संवृद्धि को एक दूसरे का पूरक माना जाता है

    खंड 2-4

    विकास के लक्ष्य

    विविधता और प्राथमिकताएँ

    विभिन्न व्यक्तियों के लिए विकास का वादा

    विकास का अर्थ विभिन्न व्यक्तियों के लिए अलग-अलग होता है। लोग ऐसी चीजें चाहते हैं जो उनके लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण हों।

    भूमिहीन ग्रामीण मज़दूर

    • काम करने के अधिक दिन
    • बेहतर मज़दूरी
    • सामाजिक भेदभाव नहीं
    • गाँव में नेता बनने का अवसर

    पंजाब के समृद्ध किसान

    • उपज के लिए ज़्यादा समर्थन मूल्य
    • मेहनती और सस्ते मज़दूर
    • उच्च पारिवारिक आय
    • बच्चों को विदेश में बसाना

    शहरी अमीर परिवार की लड़की

    • भाई के समकक्ष आज़ादी
    • अपने फ़ैसले खुद करना
    • विदेश में पढ़ाई करना

    आय और अन्य लक्ष्य

    MCQ, VSA

    लोग ज़्यादा आय चाहते हैं (नियमित काम, बेहतर मज़दूरी, अच्छी कीमतें), लेकिन यह एकमात्र लक्ष्य नहीं है।

    भौतिक लक्ष्य

    • अधिक आय
    • अधिक उपभोग
    • भौतिक वस्तुएँ

    अभौतिक लक्ष्य

    • बराबरी का व्यवहार
    • स्वतंत्रता
    • सुरक्षा
    • दूसरों से आदर

    ये अभौतिक लक्ष्य कुछ मामलों में अधिक आय और अधिक उपभोग से भी अधिक महत्वपूर्ण हो सकते हैं। बेहतर जीवन अभौतिक वस्तुओं (जैसे मित्रों की भूमिका) पर भी निर्भर करता है।

    महत्वपूर्ण: जिन चीज़ों को आसानी से मापा नहीं जा सकता उनका जीवन में बहुत महत्व है। यह निष्कर्ष निकालना गलत होगा कि जो मापा नहीं जा सकता, वह महत्व नहीं रखता।

    विकास लक्ष्यों में भिन्नता और विरोध

    MCQ, VSA, SA

    विकास लक्ष्यों में विरोध: कई बार दो व्यक्ति या दो गुट ऐसी चीजें चाह सकते हैं जिनमें परस्पर विरोध हो सकता है।

    1

    व्यक्तिगत विरोध

    एक लड़की अपने भाई के समान आज़ादी और अवसर चाहती है, जिसमें भाई द्वारा घर के काम में हाथ बँटाना भी शामिल है—जो शायद भाई को पसंद न हो।

    2

    सामाजिक विरोध

    उद्योगपति अधिक बिजली पाने के लिए ज़्यादा बाँध चाहते हैं। इससे ज़मीन जलमग्न हो सकती है और आदिवासियों का जीवन अस्त-व्यस्त हो सकता है।

    एक के लिए जो विकास है, वह दूसरे के लिए विनाशकारी भी हो सकता है।

    खंड 5-8

    विकास को मापना

    आय और उसकी सीमाएँ

    प्रतिव्यक्ति आय (Per Capita Income)

    VSA, MCQ

    गणना सूत्र

    प्रतिव्यक्ति आय = कुल आय / कुल जनसंख्या

    (इसे औसत आय भी कहते हैं)

    विश्व बैंक का वर्गीकरण (विश्व विकास रिपोर्ट 2019)

    महत्वपूर्ण: विश्व बैंक की विश्व विकास रिपोर्ट देशों का वर्गीकरण करने के लिए प्रतिव्यक्ति आय को मुख्य मानदंड मानती है।

    समृद्ध (उच्च आय) देश

    US $49,300+

    प्रति वर्ष या अधिक (2019)

    विकसित देश
    भारत की स्थिति (2019)

    US $6,700

    प्रति वर्ष

    मध्य आय वर्ग
    निम्न आय वाले देश

    US $2,500-

    प्रति वर्ष या कम (2019)

    औसत आय की सीमा

    औसत आय असमानताओं की जानकारी नहीं देती। यदि दो देशों की औसत आय समान है, लेकिन एक में आय का वितरण अत्यधिक असमान है (कुछ बहुत अमीर और ज़्यादातर गरीब), तो लोग उस देश में रहना पसंद करेंगे जहाँ आय अधिक समान रूप से वितरित है।

    नवीनतम आँकड़े (2025)

    विश्व बैंक वर्गीकरण (FY2026 – जुलाई 2025 से लागू)
    निम्न आय: $1,135 या कम
    निम्न-मध्य आय: $1,136 – $4,495
    उच्च-मध्य आय: $4,496 – $13,935
    उच्च आय: $13,935 से अधिक

    भारत: उच्च-मध्य आय वर्ग (Upper-Middle Income)

    • भारत की GDP (2025): $3.94 trillion (विश्व में 5वाँ स्थान)
    • GDP Growth Rate: 8.2% (FY 2023-24)
    • Per Capita Income (भारत): ₹2,05,579 (2025 अनुमानित)
    स्रोत: World Bank Data FY2026, Ministry of Statistics and Programme Implementation, IMF World Economic Outlook 2025
    खंड 9-12

    आय के परे

    सामाजिक संकेतक और सुविधाएँ

    तीन राज्यों की तुलना (2018-19)

    SA, LA
    राज्य प्रतिव्यक्ति आय (₹) शिशु मृत्यु दर (प्रति 1000) साक्षरता दर (%) निवल उपस्थिति अनुपात (%)
    हरियाणा ₹2,36,147 30 82% 61%
    केरल ₹2,04,105 7 96% 77%
    बिहार ₹40,982 32 61.8% 43%

    महत्वपूर्ण परिभाषाएँ

    शिशु मृत्यु दर (IMR)

    किसी वर्ष में पैदा हुए 1,000 जीवित बच्चों में से एक वर्ष की आयु से पहले मर जाने वाले बच्चों का अनुपात।

    साक्षरता दर

    7 वर्ष और उससे अधिक आयु के लोगों में साक्षर जनसंख्या का अनुपात।

    निवल उपस्थिति अनुपात (NAR)

    14-15 वर्ष की आयु के स्कूल जाने वाले कुल बच्चों का उस आयु-वर्ग के कुल बच्चों के साथ प्रतिशत।

    जीवन प्रत्याशा

    व्यक्ति की जन्म के समय औसत आयु की संभावना। यह स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता का संकेतक है।

    निष्कर्ष: हरियाणा की प्रतिव्यक्ति आय केरल से अधिक है, लेकिन वह महत्वपूर्ण सामाजिक क्षेत्रों (शिशु मृत्यु दर, साक्षरता) में केरल से बहुत पीछे है।

    सार्वजनिक सुविधाओं का महत्व

    जेब में रखा रुपया वे सभी वस्तुएँ और सेवाएँ नहीं खरीद सकता जिनकी बेहतर जीवन के लिए आवश्यकता है:

    • पैसा प्रदूषण मुक्त वातावरण नहीं खरीद सकता
    • पैसा बिना मिलावट की दवाएँ की गारंटी नहीं देता
    • संक्रामक बीमारियों से बचने के लिए पूरे समुदाय का कदम उठाना आवश्यक

    केरल में शिशु मृत्यु दर कम क्यों? क्योंकि यहाँ स्वास्थ्य और शिक्षा की मौलिक सुविधाएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (सा.वि.प्र.) ठीक प्रकार कार्य करती है।

    नवीनतम राज्य आँकड़े (2025)

    तीन राज्यों की तुलना (नवीनतम 2025)
    राज्य प्रतिव्यक्ति आय (₹) IMR साक्षरता
    हरियाणा ₹2,96,685 26 84.8%
    केरल ₹2,28,000* 5 96.2%
    बिहार ₹54,000* 35* 74.3%

    * अनुमानित आँकड़े (PLFS 2023-24 और SRS 2023 के आधार पर)

    भारत IMR (2023): 25 प्रति 1000 (ऐतिहासिक निम्न)

    भारत साक्षरता (2025): 77.7%

    जीवन प्रत्याशा: 70.19 वर्ष

    महिला साक्षरता: 70.3%

    स्रोत: SRS Bulletin 2023, PLFS Annual Report 2023-24, RBI State Finances 2024-25

    मानव विकास सूचकांक (HDI)

    SA, MCQ, LA

    HDI क्या है और इसे कौन प्रकाशित करता है?

    प्रकाशक

    UNDP (United Nations Development Programme)
    संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम

    प्रतिवर्ष Human Development Report में प्रकाशित

    HDI Score Range

    0.800+: Very High

    0.700-0.799: High

    0.550-0.699: Medium

    0.550 से कम: Low

    HDI के तीन मुख्य घटक (Components)

    स्वास्थ्य

    जीवन प्रत्याशा
    (Life Expectancy at Birth)

    शिक्षा

    साक्षरता दर + नामांकन अनुपात
    (Mean & Expected Years of Schooling)

    जीवन स्तर

    प्रतिव्यक्ति आय
    (GNI per Capita PPP $)

    पाठ्यपुस्तक के अनुसार HDI तुलना (परीक्षा हेतु)

    देश HDI रैंक (पाठ्यपुस्तक) विशेषता
    श्रीलंका 73 छोटा देश, फिर भी भारत से आगे
    भारत 132 Medium Human Development
    म्यांमार 149 भारत से पीछे

    परीक्षा में पाठ्यपुस्तक के आँकड़े (भारत रैंक 132) ही लिखें

    महत्वपूर्ण निष्कर्ष (पाठ्यपुस्तक से)

    • श्रीलंका जैसा छोटा पड़ोसी देश हर विषय में भारत से आगे है
    • नेपाल और बांग्लादेश की आय भारत से कम है, फिर भी जीवन प्रत्याशा में आगे हैं
    • आय अकेले विकास का सही माप नहीं है – HDI अधिक व्यापक दृष्टिकोण देता है

    नवीनतम HDI Report 2025 (UNDP)

    भारत की वर्तमान स्थिति (2025)

    130

    HDI रैंक (193 देशों में)

    सुधार: 133 → 130

    0.685

    HDI Score

    +53% since 1990

    72

    जीवन प्रत्याशा (वर्ष)

    1990 में 58.6 वर्ष

    देश HDI रैंक 2025 GNI/व्यक्ति ($) जीवन प्रत्याशा
    श्रीलंका 78 $12,578 76.4
    भूटान 127 – –
    भारत 130 $9,047 72.0
    बांग्लादेश 130 $6,683 72.4
    नेपाल 145 $4,883 68.4
    पाकिस्तान 168 $5,005 66.1
    • विश्व प्रथम: Iceland (HDI: 0.972)
    • भारत की श्रेणी: Medium Human Development (High के करीब – 0.700 threshold)
    • असमानता का प्रभाव: 30.7% HDI loss due to inequality
    • शिक्षा: Expected years of schooling: 13 वर्ष (1990 में 8.2 वर्ष)
    स्रोत: UNDP Human Development Report 2025 (Released May 6, 2025)

    पोषण स्तर और BMI आँकड़े

    MCQ, SA

    BMI (Body Mass Index): शरीर द्रव्यमान सूचकांक – 18.5 किग्रा/मी² से कम होने पर व्यक्ति अल्प-पोषित माना जाता है।

    BMI कैलकुलेटर (भारतीय मानक)

    वज़न और लंबाई दर्ज करें

    भारतीय BMI मानक (Asian/Indian Standards)

    < 18.5

    अल्प-पोषित

    18.5 – 22.9

    सामान्य

    23.0 – 24.9

    अधिक वज़न

    > 25

    मोटापा

    भारतीय मानक WHO मानक से भिन्न हैं (WHO: <18.5 अल्प-पोषित, 18.5-24.9 सामान्य, 25-29.9 अधिक वज़न, >30 मोटापा)

    राज्य अल्प-पोषित पुरुष (%) अल्प-पोषित महिलाएँ (%)
    केरल 8.5% 10%
    मध्य प्रदेश 28% 28%

    चिंताजनक तथ्य: भारत में लगभग आधे बच्चे कुपोषण के शिकार हैं। सरकार को सुरक्षित पेयजल, आवासीय सुविधाएं, भोजन एवं पोषण जैसे मानव विकास के पक्षों पर ध्यान देने की आवश्यकता है।

    नवीनतम पोषण आँकड़े (NFHS-5: 2019-21)

    5 वर्ष से कम आयु के बच्चों में कुपोषण

    35.5%

    Stunting (बौनापन)

    विश्व औसत: 22%

    19.3%

    Wasting (दुर्बलता)

    32.1%

    Underweight (कम वज़न)

    • Severe Acute Malnutrition: पिछले दो दशकों में लगातार बढ़ रहा है
    • एनीमिया: 30% बच्चों में केवल एनीमिया की समस्या
    • Triple Burden (SUA): 12% बच्चे Stunting + Underweight + Anaemia से ग्रस्त
    स्रोत: National Family Health Survey-5 (2019-2021), UNICEF India Report 2025

    उत्तर प्रदेश: ग्रामीण शैक्षिक असमानता

    Case Study

    पुरुष साक्षरता

    76%

    ग्रामीण पुरुष साक्षरता दर

    महिला साक्षरता

    54%

    ग्रामीण महिला साक्षरता दर

    आयु वर्ग (10-14 वर्ष) लड़के NAR (%) लड़कियाँ NAR (%)
    ग्रामीण UP 85% 82%

    संवैधानिक लक्ष्य: भारत में स्वतंत्रता के 70 वर्षों के बाद भी, कई राज्य 14 वर्ष की आयु तक के सभी बच्चों को निःशुल्क तथा अनिवार्य शिक्षा प्रदान करने के संवैधानिक लक्ष्य (जो 1960 तक पूरा होना था) के निकट भी नहीं पहुँच पाए हैं।

    नवीनतम UP शिक्षा आँकड़े (2025)

    उत्तर प्रदेश ग्रामीण साक्षरता (Census 2011 + PLFS Updates)

    76.33%

    ग्रामीण पुरुष

    53.65%

    ग्रामीण महिला

    लैंगिक अंतर: 22.68 प्रतिशत अंक

    • UP समग्र साक्षरता (2025): 78.2% (अनुमानित)
    • शहरी साक्षरता: 75.14% (पुरुष 80.45%, महिला 69.22%)
    • चुनौतियाँ: बाल विवाह, आर्थिक कठिनाइयाँ, लड़कियों की शिक्षा में बाधाएँ
    स्रोत: Census 2011, PLFS Annual Report 2023-24, UDISE+ 2023-24
    खंड 14-15

    विकास की धारणीयता

    Sustainability of Development

    धारणीयता क्या है?

    Descriptive

    धारणीयता: हम चाहेंगे कि विकास का वर्तमान स्तर बना रहे या कम से कम भावी पीढ़ी के लिए यह स्तर कायम रहे।

    “

    हमने विश्व को अपने पूर्वजों से उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं किया है—हमने इसे अपने बच्चों से उधार लिया है।

    सतत विकास लक्ष्य (SDGs)

    Sustainable Development Goals – 2030 Agenda

    परिभाषा और पृष्ठभूमि
    • अपनाया गया: 2015 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा
    • सदस्य देश: 193 देशों ने स्वीकृत किया
    • लक्ष्य वर्ष: 2030 तक प्राप्त करना
    • कुल लक्ष्य: 17 लक्ष्य और 169 उद्देश्य
    • मूल सिद्धांत: “किसी को भी पीछे न छोड़ें” (Leave No One Behind)
    इस अध्याय से संबंधित प्रमुख SDGs
    SDG 1 निर्धनता उन्मूलन

    अत्यधिक गरीबी को 2030 तक समाप्त करना

    SDG 2 शून्य भुखमरी

    भुखमरी समाप्त करना और खाद्य सुरक्षा

    SDG 3 स्वास्थ्य और कल्याण

    सभी के लिए स्वस्थ जीवन सुनिश्चित करना

    SDG 4 गुणवत्तापूर्ण शिक्षा

    समावेशी और न्यायसंगत शिक्षा

    SDG 5 लैंगिक समानता

    महिलाओं और लड़कियों को सशक्त करना

    SDG 6 स्वच्छ जल

    सभी के लिए स्वच्छ पानी और स्वच्छता

    SDG 10 असमानता में कमी

    देशों के बीच और भीतर असमानता कम करना

    SDG 13 जलवायु कार्रवाई

    जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए तत्काल कार्रवाई

    SDG 15 भूमि पर जीवन

    स्थलीय पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा

    SDGs और इस अध्याय का संबंध
    • आय के परे विकास: SDGs केवल आर्थिक वृद्धि नहीं, बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय विकास पर भी बल देते हैं
    • धारणीयता: भावी पीढ़ियों के लिए संसाधनों का संरक्षण – यही SDGs का मूल उद्देश्य है
    • समावेशी विकास: “किसी को भी पीछे न छोड़ें” – यह अध्याय में वर्णित विभिन्न लोगों के विकास लक्ष्यों से मेल खाता है
    • HDI और SDGs: दोनों UNDP द्वारा विकसित और विकास के व्यापक दृष्टिकोण पर आधारित
    भारत की SDG प्रगति (2025)
    • SDG Index Score: 71/100 (Sustainable Development Report 2024)
    • विश्व रैंक: 109/166 देशों में
    • सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन: SDG 13 (जलवायु कार्रवाई)
    • सुधार की आवश्यकता: SDG 2 (भुखमरी), SDG 3 (स्वास्थ्य), SDG 5 (लैंगिक समानता)
    स्रोत: UN Sustainable Development Report 2024, NITI Aayog SDG India Index 2024

    उदाहरण 1: भूमिगत जल

    देश के लगभग एक तिहाई भाग में भूमिगत जल भंडारों का अति-उपयोग हो रहा है।

    • पंजाब और पश्चिमी उत्तर प्रदेश (कृषि समृद्ध क्षेत्र)
    • पठारी क्षेत्र
    • तेज़ी से विकसित हो रही शहरी बस्तियाँ

    नवीकरणीय संसाधन: भूमिगत जल की पुनः पूर्ति प्रकृति (बरसात) द्वारा होती है। अति-उपयोग तब होता है जब प्रयोग पुनः पूर्ति से अधिक हो।

    उदाहरण 2: कच्चा तेल

    कच्चा तेल एक गैर-नवीकरणीय संसाधन है, जो कुछ वर्षों के प्रयोग के पश्चात् समाप्त हो जाते हैं।

    संपूर्ण विश्व में कच्चे तेल के भंडार वर्तमान दर पर लगभग 50 वर्षों में समाप्त हो जाएँगे

    भारत की स्थिति: भारत जैसे देश जिनके पास पर्याप्त भंडार नहीं है, वे इसके आयात पर निर्भर हैं।

    केस स्टडी: आइवरी कोस्ट विषाक्त अपशिष्ट घटना

    विकास के नाम पर विनाश का उदाहरण

    एक बहुराष्ट्रीय कंपनी ने आइवरी कोस्ट के अबिदजान शहर में जहरीले तरल अवशेष समुद्र में डाल दिए।

    7

    लोग मारे गए

    26,000

    लोगों का विषाक्तता के कारण इलाज

    सबक: कुछ आर्थिक गतिविधियाँ एक क्षेत्र के लिए विनाशकारी हो सकती हैं। पर्यावरण में गिरावट के परिणाम राष्ट्रीय और राज्य सीमाओं का ख्याल नहीं रखते। हम सबका भविष्य परस्पर जुड़ा हुआ है।

    पर्यावरण संकट: नवीनतम आँकड़े (2025)

    भूमिगत जल संकट (CGWB Report 2023)

    11.23%

    अति-दोहित ब्लॉक

    (736 assessment units)

    17%

    Overexploited

    241.34 bcm

    वार्षिक निष्कर्षण

    2080 तक भूजल हानि दर 3 गुना हो सकती है

    भूजल निर्भरता:

    • • सिंचाई का 62%
    • • ग्रामीण जल आपूर्ति का 85%
    • • शहरी जल आपूर्ति का 50%

    कच्चा तेल (2025):

    • • विश्व भंडार: ~47-50 वर्ष शेष
    • • भारत आयात निर्भरता: 85%
    • • वन क्षेत्र: 21.71% (लक्ष्य 33%)
    स्रोत: Central Ground Water Board (CGWB) Report 2023, Dynamic Groundwater Resource Assessment 2023, BP Statistical Review of World Energy 2024
    खंड 16

    अध्याय का सारांश

    प्रमुख तथ्य और निष्कर्ष

    1

    विकास के लक्ष्य हर व्यक्ति के लिए अलग हो सकते हैं और उनमें विरोध संभव है।

    2

    आय के अतिरिक्त, लोग स्वतंत्रता, सुरक्षा, आदर जैसे अभौतिक लक्ष्यों को भी महत्व देते हैं।

    3

    औसत आय का उपयोग किया जाता है, लेकिन यह असमान वितरण को छिपाती है।

    4

    केरल का उदाहरण: बेहतर सार्वजनिक सुविधाओं की उपलब्धता आय से अधिक महत्वपूर्ण है।

    5

    HDI शिक्षा, स्वास्थ्य, और आय के आधार पर तुलना करता है। (भारत: 134, श्रीलंका: 78)

    6

    विकास की धारणीयता – संसाधनों का अति-उपयोग चिंता का विषय है।

    विकास या प्रगति का प्रश्न हमेशा चलने वाला प्रश्न है और इस पर बहस जारी है।

    यह सामग्री ‘विकास’ (Development) अध्याय पर आधारित है, जिसे विशेष रूप से परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए तैयार किया गया है।

    2024-25 | कक्षा 10 – अर्थशास्त्र | Updated: Nov 2024